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गुजरात में नशा संकट: शब्दों की लड़ाई नहीं, सामूहिक संघर्ष की आवश्यकता

गुजरात को पूरे देश में एक ऐसे राज्य के रूप में जाना जाता है जिसने विकास, उद्यमिता और सामाजिक अनुशासन का एक अनूठा मॉडल प्रस्तुत किया। परंतु आज स्थिति चिंताजनक दिशा में बढ़ती दिख रही है। विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस पार्टी, यह आरोप लगातार उठा रही है कि राज्य में स्थानीय और ब्रांडेड शराब, एमडी ड्रग्स (MD Drugs) और अन्य नशीले पदार्थों का व्यापक प्रसार हो चुका है। हो सकता है विपक्षी नेताओं की भाषा कई बार कठोर या राजनीतिक रूप से उग्र प्रतीत हो, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि नशे का फैलाव किसी भी राजनीतिक सीमारेखा से कहीं बड़ा और खतरनाक मुद्दा बन चुका है। वास्तविकता यह है कि नशा एक अजगर बन चुका है, जो धीरे-धीरे और चुपचाप समाज को जकड़ रहा है, और यदि समय रहते हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसकी कीमत चुकाएँगी।

मैंने स्वयं हाल ही में बनासकांठा के एक सेवानिवृत्त शिक्षक से बातचीत की। उन्होंने कहा, “बनासकांठा अब ‘उड़ता पंजाब’ बनता जा रहा है। खेतों में काम करने वाला मजदूर भी एमडी ड्रग्स की गिरफ्त में है और दुख की बात यह है कि महिलाएँ भी इस चक्र में फँसती जा रही हैं।” यह स्थिति सिर्फ एक जिले या एक क्षेत्र की नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि नशे का दानव गाँव-गाँव, कस्बों और शहरों में अपने पैर पसार रहा है। आज कोई भी अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकता चाहे वे राजनेताओं के बच्चे हों, अधिकारियों के, व्यवसायियों के, या आम नागरिकों के। नशे का संकट किसी वर्ग, जाति या आर्थिक स्थिति को नहीं देखता, वह सबको समान रूप से निगलने का सामर्थ्य रखता है।

मोबाइल फोन, जो तकनीक और प्रगति का प्रतीक माना जाता है, वह आज युवाओं के लिए नशे तक सबसे आसान पहुँच का माध्यम बन चुका है। सोशल मीडिया पर चमकदार जीवनशैली, महँगी कारें, विदेशी पर्यटन, शोरगुल वाले पार्टी कल्चर की तस्वीरें युवा मन को सीधे प्रभावित करती हैं। वे यह नहीं समझते कि यह जीवन दिखावे का एक हिस्सा है, जिसे पाने के लिए वर्षों की मेहनत, अनुशासन और संघर्ष की आवश्यकता होती है। बिना परिश्रम के विलासिता का सपना देखने वाला युवा जल्द ही ऐसे शॉर्टकट ढूँढता है, और यही रास्ता उसे नशे, अपराध और जीवन-विनाश की ओर ले जाता है। बेरोजगारी इस मानसिकता को और बढ़ावा देती है। जब भविष्य असुरक्षित लगता है, तब नशा एक पल की राहत जैसा दिखाई देता है, पर धीरे-धीरे वही राहत जीवन का सबसे बड़ा दुःस्वप्न बन जाती है।

शिक्षा प्रणाली की विफलता भी इस समस्या की एक बड़ी जड़ है। विद्यालय और कॉलेज ज्ञान तो देते हैं, पर जीवन के मूल्य, उद्देश्य, अनुशासन और नैतिक शक्ति विकसित करने में विफल हो जाते हैं। लाखों डिग्रीधारी युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं, लेकिन जीवन की दिशा और अर्थ समझने वाला युवावर्ग तेजी से कम होता जा रहा है। जब शिक्षा चरित्र निर्माण का काम छोड़ दे और केवल रोजगार का साधन बन जाए, तब समाज में नैतिक गिरावट की शुरुआत होती है, और नशा इसी खालीपन का सबसे आसान भराव बन जाता है।

सबसे दुखद और दुखदायी पहलू यह है कि इस बेहद गंभीर विषय पर चर्चा समाधान के बजाय राजनीति की खींचतान में बदल गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही भाषा, आरोप, और बयानबाज़ी पर लड़ रहे हैं, लेकिन समस्या से लड़ने में कोई ठोस एकजुट प्रयास नज़र नहीं आता। मुद्दे की गंभीरता पर विचार करने के बजाय बयान की कठोरता पर प्रतिक्रिया दी जा रही है। अपराधियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई पर बात करने की बजाय शब्दों की जंग चल रही है। यह जनता के साथ अन्याय और आने वाली पीढ़ी के प्रति अपराध है।

गुजरात ने हमेशा भारत को रास्ता दिखाया है – विकास का मॉडल, अनुशासन की संस्कृति, उद्यमिता की भावना, और सामाजिक एकजुटता के माध्यम से। आज फिर समय आ गया है कि गुजरात देश को एक नई दिशा दिखाए। इस लड़ाई में सरकार, विपक्ष, प्रशासन, मीडिया, सामाजिक संगठन, धनी-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित सभी को एकजुट होकर कार्य करना होगा। नशे के विरुद्ध संघर्ष राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक युद्ध है।

सरकार को चाहिए कि विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों को आलोचना के रूप में नहीं, बल्कि चिंतन और सुधार के अवसर के रूप में देखे। विपक्ष को भी केवल नारेबाजी नहीं, बल्कि व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने चाहिए। समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी भूमिका निभानी होगी स्कूलों और कॉलेजों में नशा-विरोधी जागरूकता अभियान, परिवारों में खुली बातचीत, समुदाय में समर्थन प्रणाली, पुलिस और प्रशासन में कठोर कार्रवाई, और मीडिया में जिम्मेदार रिपोर्टिंग।

समय आ गया है कि गुजरात आवाज बुलंद करके कहे:
हम नशे को अपनी पीढ़ियों को बर्बाद नहीं करने देंगे।
हम इस दानव से सामूहिक युद्ध करेंगे।
हमारे बच्चे सुरक्षित रहेंगे और हमारा समाज मजबूत बनेगा।

सारी जिम्मेवारी सिर्फ सरकारकी नहीं है, सभीको अपने अपने स्तर पर प्रयास करने होंगे और जहाँ आवश्यक हो, सरकारी तंत्र को सहायता करनी होगी।

यह संघर्ष लंबा है, कठिन है, लेकिन यदि हम एकजुट हो जाएँ, तो जीत निश्चित है।

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2 responses to “गुजरात में नशा संकट: शब्दों की लड़ाई नहीं, सामूहिक संघर्ष की आवश्यकता”

  1. Bhavesh Bhalani Avatar
    Bhavesh Bhalani

    ખુબ સરસ ……..ખુદ પબ્લિક જાગૃત થાય તો આ નશાનું દૂષણ દૂર થઈ શકે….બાકી રાજકીય પક્ષો આ બાબતે આંખ આડા કાન કરી રહ્યા છે.કાનૂન પણ એમ ચાહે છે કે અમને તો ભારોભાર રિશ્વત મળે છે એટલે ઠોસ કદમ કાનૂન ઉઠાવશે નહીં.બાકી કાનૂન ધારે તો નશાખોરી રોકી શકે તેમ છે.

    1. Kuldeep Sagar Avatar
      Kuldeep Sagar

      હા, માત્ર સરકારના ભરોસે બેસી રહેવાથી આ દિશામાં સારું પરિણામ નહી આવે. દરેકે દરેકની ફરજ અદા કરવી રહી, સરકાર આ મુદ્દે સરેઆમ નિષ્ફળ રહી છે. હવે જનતાએ જાગવું પડશે. અન્યથા ભાવિ પેઢી બરબાદ થશે એ નક્કી.

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