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पुस्तक समीक्षा: घुमंतु जनजातियाँ – समाज का उपेक्षित वर्ग

घुमंतु जनजातियाँ – समाज का उपेक्षित वर्ग एक शोधपरक और समाजोन्मुखी पुस्तक है, जो भारत की घुमंतु और स्थानांतरणशील जनजातियों के जीवन, संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डालती है। इस पुस्तक में लेखक ने गहन अनुसंधान और विस्तृत क्षेत्रीय अनुभव के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि कैसे ये समुदाय लंबे समय से समाज के मुख्यधारा से अलग-थलग और उपेक्षित रह गए हैं।

पुस्तक की विशेषता इसकी संवेदनशीलता और वास्तविकता को पकड़ने की क्षमता है। लेखक ने न केवल इतिहास और सांस्कृतिक पहलुओं का विवरण दिया है, बल्कि आज के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक संकटों को भी उजागर किया है। इस दौरान पाठक को यह समझ में आता है कि किस तरह सरकारी नीतियों और सामाजिक पूर्वाग्रहों ने इन समुदायों के जीवन को प्रभावित किया है।

लेखक ने आंकड़ों, केस स्टडीज़ और व्यक्तिगत साक्षात्कारों का उपयोग करते हुए घुमंतु जनजातियों की दैनंदिन समस्याओं को जीवंत ढंग से प्रस्तुत किया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। पुस्तक यह संदेश देती है कि समाज और सरकार की सक्रिय भागीदारी के बिना इन समुदायों का सशक्तिकरण संभव नहीं है।

सामाजिक न्याय, नीति निर्माण और अनुसंधान के क्षेत्र में काम करने वाले छात्रों, शोधकर्ताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल जानकारी देती है, बल्कि पाठकों को सोचने और बदलाव की दिशा में कदम उठाने के लिए प्रेरित भी करती है।

निष्कर्ष:
घुमंतु जनजातियाँ – समाज का उपेक्षित वर्ग एक गंभीर और विचारशील पुस्तक है, जो भारत के उपेक्षित और संवेदनशील वर्गों की स्थिति को समझने और उनकी आवाज़ को समाज के समक्ष लाने का महत्वपूर्ण प्रयास करती है। यह पुस्तक सामाजिक चेतना बढ़ाने और नीति निर्धारण में मार्गदर्शन देने में सक्षम है।

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